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India-EU Summit 2026 : “ग्लोबल ऑर्डर का रिस्क कम होगा,” EAM जयशंकर ने भारत-EU समिट पर भरी हुंकार; स्पोर्ट्स इकॉनमी को मिलेगी रफ्तार

नई दिल्ली — विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आज वैश्विक मंच से दुनिया को स्पष्ट संदेश दिया। भारत-यूरोपीय संघ (EU) शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि यह साझेदारी “ग्लोबल ऑर्डर” में बढ़ते जोखिमों को कम करने के लिए एक मजबूत ढाल है। भारत द्वारा यूरोपीय संघ के 96% से अधिक सामानों पर टैरिफ कम करने के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में हलचल मचा दी है। यह कदम न केवल कूटनीतिक है, बल्कि भारतीय खेल जगत और एथलीट्स के लिए भी नए रास्ते खोलने वाला है।

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मैदान से बाजार तक: क्या बदलेगा?

जयशंकर का “De-risking” का विजन सीधे तौर पर उन सप्लाई चेन को मजबूत करता है जो अब तक अस्थिर थीं। खेल के मैदान पर इस्तेमाल होने वाली हाई-एंड तकनीक, जैसे जर्मनी के एथलेटिक ट्रैक गियर या फ्रांस की एडवांस साइकलिंग किट्स, अब भारी टैक्स के बोझ से मुक्त होंगी। भारत ने अपने टैरिफ को 9.3% के औसत से घटाकर शून्य की ओर ले जाने का रास्ता साफ कर दिया है।

जालंधर और मेरठ के निर्यातकों के लिए भी यह किसी फाइनल मैच की जीत जैसा है। भारतीय खेल उत्पादों को अब यूरोप के 27 देशों में 0% ड्यूटी के साथ सीधा प्रवेश मिलेगा। यह भारतीय ब्रांड्स को चीन और वियतनाम के मुकाबले खड़ा होने की ताकत देगा।

व्यापार का नया स्कोरकार्ड

श्रेणी पुराना शुल्क नया समझौता
यूरोपीय स्पोर्ट्स मशीनरी 44% तक पूरी तरह माफ
भारतीय टेक्सटाइल/स्पोर्ट्स वियर ~12% 0% ड्यूटी
प्रीमियम विदेशी जूते 20-30% चरणबद्ध कटौती

दिग्गजों की जुबानी

“आज का समझौता भारत और यूरोप को एक ऐसे भविष्य की ओर ले जाएगा जहां सप्लाई चेन सुरक्षित होगी और ग्लोबल ऑर्डर का रिस्क कम होगा। यह साझेदारी मल्टीपोलर दुनिया की जरूरत है।” — एस. जयशंकर, विदेश मंत्री, भारत

“हमने 18 साल का सूखा खत्म किया है। यह डील भारत के उभरते मध्यम वर्ग और यूरोप की हाई-टेक इंडस्ट्री, दोनों के लिए ‘विन-विन’ स्थिति है।” — उर्सुला वॉन डेर लेयेन, अध्यक्ष, यूरोपीय आयोग

आगे का खेल: क्या होंगे रणनीतिक बदलाव?

जयशंकर के इस बयान के पीछे का असली खेल आर्थिक सुरक्षा है। अमेरिका की बदलती व्यापार नीतियों के बीच भारत ने यूरोप के साथ हाथ मिलाया है। इसका मतलब है कि भविष्य में अगर वैश्विक बाजार डगमगाता भी है, तो भारत के पास एक स्थिर पार्टनर होगा। खेल जगत के लिए यह R&D (अनुसंधान और विकास) में निवेश बढ़ाने का मौका है। यूरोपीय कंपनियां अब भारत में अपनी यूनिट्स लगाने के लिए अधिक उत्साहित होंगी, क्योंकि कच्चे माल और पुर्जों का आयात अब महंगा नहीं रह गया है।

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