[metaslider id="31163"]
Featuredदेश

राज्यपाल का कानून बनाने में कोई रोल नहीं: सुप्रीम कोर्ट में बंगाल, तेलंगाना और हिमाचल की दलील

gmedianews24.com/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश सरकारों ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण दलील पेश करते हुए कहा कि राज्यपालों का कानून बनाने की प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं होती। इन राज्यों ने आरोप लगाया कि उनके राज्यपाल जानबूझकर विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने में देरी कर रहे हैं, जिससे संवैधानिक संकट पैदा हो रहा है।

बिलासपुर में दर्दनाक हादसा: खेलते-खेलते गले में चना फंसने से 16 महीने के मासूम की मौत

क्या है मामला?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए एक निश्चित समय सीमा तय करने की मांग की गई है ताकि वे विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर फैसला कर सकें। इस मामले की सुनवाई के दौरान, राज्यों के वकीलों ने अपनी दलीलें पेश कीं।

दलीलें और तर्क:

  1. राज्यपाल का रोल सीमित: पश्चिम बंगाल सरकार के वकील ने कहा कि राज्यपालों का काम सिर्फ विधेयकों को अनुमोदित करना है, न कि उन पर सवाल उठाना या उन्हें वापस भेजना। उनका कहना था कि राज्यपाल का पद केवल एक संवैधानिक औपचारिकता है, और वे किसी भी कानून के निर्माण में कोई भूमिका नहीं निभाते हैं।
  2. लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान: तेलंगाना सरकार के वकील ने कहा कि राज्यपालों को राज्य विधानसभाओं की लोकतांत्रिक इच्छा का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि जब एक विधेयक बहुमत से पारित हो जाता है, तो उसे रोकना जनता की इच्छा का अनादर है।
  3. समय सीमा की जरूरत: हिमाचल प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह राज्यपालों के लिए एक निश्चित समय सीमा तय करे, ताकि वे लंबित विधेयकों पर जल्द से जल्द निर्णय ले सकें। उन्होंने कहा कि अनिश्चितकाल तक विधेयकों को रोके रखना राज्य के कामकाज में बाधा डालता है।

क्या कहता है संविधान?

संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत, राज्यपाल के पास किसी भी विधेयक को मंजूरी देने, उसे रोककर रखने, या राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखने का अधिकार है। हालांकि, संविधान में कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की गई है कि राज्यपाल को कितने दिनों के भीतर विधेयक पर निर्णय लेना है।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर रहा है और यह देखना बाकी है कि वह इस पर क्या फैसला लेता है। यह फैसला राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच के संबंधों को फिर से परिभाषित कर सकता है।

 

Related Articles

Back to top button