
gmedianews24.com/पटना/नई दिल्ली। बिहार चुनाव से पहले मतदाताओं को लुभाने के लिए अब तक ₹33,920 करोड़ के वादे किए जा चुके हैं। लेकिन राज्यों में लोकलुभावन घोषणाओं ने वित्तीय मोर्चे पर सरकारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ब्याज अदायगी और वेतन-भत्तों जैसे तय खर्च घटाना संभव नहीं है, ऐसे में आय का बड़ा हिस्सा चुनावी वादे पूरे करने में खप रहा है। इसका असर सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के बजट पर पड़ रहा है।
तेलंगाना की स्थिति
तेलंगाना सरकार की कमाई का 57% हिस्सा चुनावी वादों पर खर्च हो रहा है। वहीं, कमाई का 80% वेतन-भत्तों में चला जाता है। यही सरकार पुरानी पेंशन का वादा भी लाई थी। लाड़ली बहन योजना पर ही कमाई का 22% हिस्सा जा रहा है।
कर्नाटक सरकार पर बोझ
6 गारंटी के वादों के साथ सत्ता में आई कर्नाटक सरकार की कमाई का 35% हिस्सा इन्हीं गारंटियों को पूरा करने में खर्च हो रहा है। इसके अलावा 40% राशि वेतन-भत्ते और कर्ज पर ब्याज चुकाने में जा रही है। नतीजतन, सड़क मरम्मत जैसे बुनियादी कार्यों के लिए भी बजट जुटाना मुश्किल हो रहा है।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़
2024-25 में जिन बड़े राज्यों में उधारी बढ़ी है, उनमें मध्य प्रदेश शीर्ष पर है। यहां कमाई का 42% हिस्सा वेतन-भत्ते और ब्याज, जबकि 27% मुफ्त योजनाओं पर खर्च किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में सरकार अपनी कमाई का 18% हिस्सा चुनावी वादे पूरे करने पर लगा रही है। नतीजा यह है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च में कटौती करनी पड़ी है।






