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मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच रूस भारत को देगा कच्चा तेल, 95 लाख बैरल रास्ते में; होर्मुज मार्ग पर संकट से बढ़ी चिंता

gmedianews24.com/नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई स्थिति सामने आई है। खबर है कि Russia भारत को अतिरिक्त कच्चा तेल उपलब्ध कराने के लिए तैयार हो गया है। उद्योग जगत के सूत्रों के मुताबिक करीब 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल जहाजों में लदा हुआ भारतीय समुद्री क्षेत्र के पास मौजूद है और इसे आने वाले कुछ हफ्तों में भारत पहुंचाया जा सकता है।

सूत्रों के अनुसार यह आपूर्ति भारतीय रिफाइनरियों को तत्काल राहत दे सकती है। वर्तमान में भारत के पास कच्चे तेल का भंडार लगभग 25 दिनों की मांग को पूरा करने लायक ही बचा हुआ है। इसके अलावा रिफाइनरियों के पास गैसोल, गैसोलीन और पेट्रोलियम गैस का भी सीमित स्टॉक बताया जा रहा है।

वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत तलाश रहा भारत

सरकारी सूत्रों के अनुसार India की सरकार मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध की स्थिति को देखते हुए कच्चे तेल के वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश कर रही है। ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए अलग-अलग देशों से तेल आपूर्ति बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।

होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता

विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध का वैश्विक तेल बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है, क्योंकि भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल निर्यात मार्गों में से एक माना जाता है। अगर इस मार्ग पर आपूर्ति बाधित होती है तो भारत सहित कई देशों को वैकल्पिक रास्ते और स्रोत तलाशने पड़ सकते हैं।

रूस बढ़ा सकता है तेल आपूर्ति

सूत्रों के मुताबिक Russia भारत की कच्चे तेल की जरूरतों का करीब 40 प्रतिशत तक पूरा करने में मदद करने के लिए तैयार है। आंकड़ों के अनुसार जनवरी में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात घटकर लगभग 1.1 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया था, जो नवंबर 2022 के बाद सबसे कम स्तर था।

हालांकि फरवरी में रूस की हिस्सेदारी फिर बढ़कर लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच गई। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात के बीच रूस से तेल आयात बढ़ सकता है।

ट्रंप के बयान पर भारत का रुख

इस बीच Donald Trump ने हाल ही में दावा किया था कि नई दिल्ली ने रूस से तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई है। हालांकि भारत ने इस दावे से साफ इनकार किया है और कहा है कि उसकी ऊर्जा आयात नीति बाजार की परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर निर्भर करती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है, जिसका असर भारत सहित दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने की आशंका है।

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