
gmedianews24.com/घर में मंदिर या पूजा स्थान हिंदू परिवार का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यही वह स्थान होता है जहां रोजाना भगवान की पूजा-अर्चना की जाती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। वास्तु शास्त्र में मंदिर की दिशा, स्थान, मूर्ति की संख्या और साफ-सफाई से जुड़े कई महत्वपूर्ण नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
पूजा स्थान की सही दिशा
वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में मंदिर या पूजा स्थान हमेशा ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा में बनाना सबसे शुभ माना जाता है। इस दिशा में मंदिर होने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और घर में शांति बनी रहती है।
पूजा करते समय साधक का मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। यदि उत्तर-पूर्व में जगह उपलब्ध न हो, तो पूर्व या उत्तर दिशा में भी मंदिर बनाया जा सकता है। दक्षिण या पश्चिम दिशा में पूजा स्थान बनाने से बचना चाहिए।
पूजा स्थान की ऊंचाई और स्थान
पूजा स्थान की ऊंचाई उसकी चौड़ाई से अधिक होनी चाहिए। मंदिर छोटा, व्यवस्थित और साफ-सुथरा होना चाहिए।
मंदिर को सीढ़ियों के नीचे, किचन, बाथरूम या बेडरूम के पास नहीं बनाना चाहिए। यदि एक ही कमरे में मंदिर हो, तो रात में उसे पर्दे से ढक देना उचित माना जाता है। पूजा स्थान के आसपास हमेशा साफ-सफाई बनाए रखें।
मूर्तियों की संख्या और आकार
वास्तु के अनुसार मंदिर में एक ही देवता की एक से अधिक मूर्तियां या चित्र नहीं रखने चाहिए। इससे ऊर्जा असंतुलित मानी जाती है।
मूर्ति या तस्वीर का आकार बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए। टूटी-फूटी या क्षतिग्रस्त मूर्तियां घर में नहीं रखनी चाहिए। मंदिर में केवल देवी-देवताओं की प्रतिमाएं या चित्र रखें, किसी मृत व्यक्ति की तस्वीर मंदिर में नहीं लगानी चाहिए।
रंग और साफ-सफाई का रखें ध्यान
पूजा स्थान की दीवारों का रंग हल्का और शांत होना चाहिए, जैसे सफेद, क्रीम, हल्का पीला या हल्का नारंगी। गहरे रंगों का उपयोग करने से बचें।
मंदिर की रोज सफाई करें, सुगंधित धूप या अगरबत्ती जलाएं और समय-समय पर गंगाजल का छिड़काव करें। इससे वातावरण पवित्र और सकारात्मक बना रहता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि इन वास्तु नियमों का सही पालन किया जाए तो घर में सुख, शांति और समृद्धि का वातावरण बना रहता है।







