
gmedianews24.com/हिंदू धर्म में माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व होता है। इस दिन को भीष्म अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन तिथि 26 जनवरी को पड़ रही है। मान्यता है कि इसी दिन महाभारत के महान योद्धा पितामह भीष्म ने अपनी इच्छा से देह त्याग किया था। इस कारण यह तिथि पितरों की शांति और पितृ दोष निवारण के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, भीष्म अष्टमी के दिन पितरों का तर्पण करने से वे प्रसन्न होते हैं और कुंडली में मौजूद पितृ दोष के अशुभ प्रभाव समाप्त होते हैं। माना जाता है कि इस दिन किए गए तर्पण से सात पीढ़ियों तक के पितर तृप्त होते हैं और परिवार में सुख, शांति व समृद्धि आती है।
क्यों किया जाता है भीष्म पितामह का तर्पण?
पितामह भीष्म आजीवन बाल ब्रह्मचारी रहे, इसलिए उनकी कोई संतान नहीं थी जो उनका श्राद्ध या तर्पण कर सके। उनकी तपस्या और त्याग से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया था कि जो भी व्यक्ति भीष्म अष्टमी के दिन उनके निमित्त तर्पण और जल अर्पण करेगा, उसके पितरों को तृप्ति मिलेगी और जीवन से पितृ दोष के कष्ट कम होंगे।
भीष्म अष्टमी पर पितृ तर्पण की सही विधि
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भीष्म अष्टमी के दिन दोपहर के समय कुतप काल में तर्पण करें।
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सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
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दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें।
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तांबे या पीतल के पात्र में शुद्ध जल लें।
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उसमें गंगाजल, कच्चा दूध, काले तिल, अक्षत और जौ मिलाएं।
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दाहिने हाथ की अनामिका में कुशा की अंगूठी पहनें या हाथ में कुशा रखें।
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जल को अंजलि से धीरे-धीरे छोड़ते हुए पितरों के वैदिक मंत्रों का जप करें।
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तर्पण के दौरान इस मंत्र का जाप करें—
“वैयाघ्रपादगोत्राय सांकृत्यप्रवराय च।
गंगापुत्राय भीष्माय सर्वभूतहिताय च॥” -
पितरों के साथ-साथ भीष्म पितामह का ध्यान कर उन्हें भी जल अर्पित करें।
पितृ दोष से मुक्ति के उपाय
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इस दिन काले तिल और गुड़ का दान करने से राहु-शनि दोष और पितृ दोष से राहत मिलती है।
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शाम के समय दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाएं या पीपल के वृक्ष के नीचे दीया रखें।
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भीष्म अष्टमी के दिन तामसिक भोजन, नकारात्मक विचार और विवाद से दूर रहें।
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मन में श्रद्धा और आस्था का भाव बनाए रखें।







