
gmedianews24.com/हिंदू धर्म में वसंत पंचमी का पर्व केवल विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। वसंत पंचमी के अवसर पर किए जाने वाले इस स्नान को वसंत स्नान कहा जाता है। खासतौर पर प्रयागराज, हरिद्वार और काशी जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में गंगा और संगम में आस्था की डुबकी लगाते हैं।
मान्यता है कि वसंत पंचमी 2026 के दिन किया गया पवित्र स्नान व्यक्ति के सभी पापों का नाश करता है, शरीर और मन को शुद्ध करता है तथा आरोग्य और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
वसंत पंचमी स्नान का धार्मिक महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, वसंत पंचमी के दिन स्नान और दान का विशेष फल प्राप्त होता है।
-
इस दिन ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा का संचार सर्वाधिक माना जाता है।
-
वसंत पंचमी माघ मास में आती है और शास्त्रों में कहा गया है कि माघ में पवित्र नदियों में स्नान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
-
यह स्नान केवल शरीर की नहीं, बल्कि मन की नकारात्मकता को भी दूर करता है।
-
स्नान के बाद दान-पुण्य करने से कुंडली में बृहस्पति और चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है।
वसंत पंचमी स्नान की विधि
शास्त्रों के अनुसार, वसंत पंचमी के दिन सूर्योदय से पूर्व या सूर्योदय के समय स्नान करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है, जिसे अमृत बेला कहा जाता है।
-
यदि पवित्र नदी में स्नान संभव न हो, तो घर पर स्नान के पानी में थोड़ा गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करें।
-
स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण करें, क्योंकि पीला रंग मां सरस्वती और वसंत ऋतु का प्रतीक है।
-
स्नान करते समय ‘ॐ नमो नारायणाय’ या ‘गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती’ मंत्र का जप करना शुभ माना गया है।
स्नान के बाद दान-पुण्य का महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, स्नान तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसके बाद तर्पण और दान न किया जाए। स्नान के पश्चात सूर्य देव को अर्घ्य दें और फिर मां सरस्वती की विधिवत पूजा करें। इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को पीले अनाज, वस्त्र और शिक्षा से जुड़ी सामग्री दान करने से जीवन में यश, कीर्ति और विद्या की प्राप्ति होती है।







