[metaslider id="31163"]
Featuredदेश

पश्चिम बंगाल SIR विवाद: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, 12 लाख मतदाताओं के नाम सार्वजनिक हों

gmedianews24.com/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम आदेश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर नोटिस पाने वाले करीब 12 लाख मतदाताओं के नाम सार्वजनिक किए जाएं और उन्हें संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि वर्तनी (मात्रा) की मामूली गलतियों या पुराने पारिवारिक रिकॉर्ड में अंतर के कारण किसी भी वैध मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाया नहीं जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ऐसी तकनीकी त्रुटियों के आधार पर मताधिकार छीनना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि माता-पिता और बच्चों के बीच कम उम्र के अंतर को आधार बनाकर भी किसी का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता। पीठ ने कहा कि भारत जैसे देश में बाल विवाह एक कड़वी सच्चाई रही है, ऐसे में उम्र के अंतर को ‘तार्किक विसंगति’ मानना उचित नहीं है।

सुनवाई के दौरान तृणमूल कांग्रेस नेता डेरेक ओ’ब्रायन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने अदालत को बताया कि कई मामलों में दादा-दादी या नाना-नानी के बीच उम्र के अंतर और नामों की वर्तनी में अंतर के आधार पर नोटिस जारी किए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केवल नामों की स्पेलिंग अलग होने पर भी मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

वहीं चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि कुछ मामलों में माता-पिता और बच्चों के बीच मात्र 15 साल का आयु अंतर पाया गया है। इस पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सवाल उठाते हुए कहा कि मां और बेटे के बीच 15 साल का अंतर कैसे तार्किक विसंगति हो सकता है, जब देश में बाल विवाह जैसी सामाजिक वास्तविकताएं मौजूद रही हैं।

Related Articles

Back to top button