
gmedianews24.com/नई दिल्ली। कुछ दिन पहले सोमनाथ की पवित्र भूमि पर आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में देशभर से लोगों की भागीदारी देखने को मिली। इस दौरान ऐसे लोगों से संवाद हुआ, जो पहले सौराष्ट्र–तमिल संगमम और काशी–तमिल संगमम जैसे आयोजनों का हिस्सा रह चुके हैं। इन मंचों को लेकर लोगों की सकारात्मक सोच ने यह स्पष्ट कर दिया कि ऐसे आयोजन देश की सांस्कृतिक एकता को नई मजबूती दे रहे हैं।
तमिल संस्कृति को बढ़ावा, ‘एक भारत–श्रेष्ठ भारत’ की भावना मजबूत
पूर्व में ‘मन की बात’ के एक एपिसोड में तमिल भाषा न सीख पाने का उल्लेख करते हुए यह कहा गया था कि तमिल संस्कृति को देशभर में लोकप्रिय बनाने के प्रयास निरंतर जारी हैं। सरकार की यह पहल ‘एक भारत–श्रेष्ठ भारत’ की भावना को और सशक्त कर रही है। भारतीय संस्कृति में संगम का विशेष महत्व रहा है और इसी परंपरा को जीवंत करता है काशी–तमिल संगमम।
काशी और तमिलनाडु का ऐतिहासिक संबंध
काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है, वहीं तमिलनाडु में रामेश्वरम् तीर्थ स्थित है। तमिलनाडु की तेनकासी को दक्षिण की काशी कहा जाता है। महाकवि सुब्रमण्यम भारती को भी काशी में आध्यात्मिक और बौद्धिक जागरण का अवसर मिला, जिसने उनके राष्ट्रवाद को नई दिशा दी। ऐसे अनेक उदाहरण काशी और तमिलनाडु के गहरे आत्मीय संबंधों को दर्शाते हैं।
2022 से शुरू हुई परंपरा, हर साल नए आयाम
वर्ष 2022 में वाराणसी में काशी–तमिल संगमम की शुरुआत हुई। इसके बाद हर संस्करण में इसे और व्यापक बनाया गया।
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2023 में टेक्नोलॉजी का व्यापक उपयोग हुआ, ताकि भाषा बाधा न बने।
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तीसरे संस्करण में इंडियन नॉलेज सिस्टम पर विशेष फोकस रहा।
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चौथा संस्करण 2 दिसंबर 2025 को शुरू हुआ, जिसकी थीम थी “तमिल करकलम्” यानी तमिल सीखें।
तमिल सीखने का अनूठा अवसर
चौथे संस्करण में तमिलनाडु से आए शिक्षकों ने काशी के विद्यार्थियों को तमिल भाषा से परिचित कराया। इसके साथ ही प्राचीन तमिल ग्रंथ तोलकाप्पियम का चार भारतीय और छह विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया।







