
gmedianews24.com//गुवाहाटी। असम इन दिनों गहरे शोक और राजनीतिक तनाव से गुजर रहा है। मशहूर गायक जुबीन गर्ग की मौत से जहां राज्य भर में मातम पसरा है, वहीं दूसरी ओर मटक समेत 6 आदिवासी जनजातियां सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आई हैं। बीते 10 दिनों में मटक समुदाय ने डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया में दो विशाल रैलियां की हैं, जिनमें हर बार 30 से 40 हजार आदिवासी मशालें लेकर शामिल हुए।
मटक समुदाय अनुसूचित जनजाति का दर्जा और सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक फैसले खुद लेने का अधिकार चाहता है। इसके साथ ही पांच अन्य जनजातियां भी आंदोलन में शामिल हो चुकी हैं। ये सभी मिलकर राज्य की कुल आबादी का करीब 12% हिस्सा हैं। आंदोलन की कमान युवा वर्ग ने संभाल रखी है और रैलियों में 30 साल से कम उम्र के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है।
मांगें पुरानी, लेकिन हल नहीं
ऑल असम मटक स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष संजय हजारिका ने कहा—“हम मूल रूप से जनजाति हैं, लेकिन आज तक दर्जा नहीं मिला। सरकार ने हर बार धोखा दिया है। अब हम आंदोलन तब तक जारी रखेंगे, जब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकलता। मटक बहुल जिलों से लेकर दिल्ली तक रैली करेंगे।”
दरअसल, मटक समुदाय की मांग काफी पुरानी है। सरकार और प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन नतीजा शून्य रहा। विधानसभा चुनाव नजदीक होने के कारण सीएम हिमंता बिस्व सरमा दबाव में हैं। उन्होंने समुदाय को बातचीत के लिए कई बार बुलाया, लेकिन मटक नेताओं ने मना कर दिया और सड़कों पर उतरने का फैसला किया।
पहली बार इतने बड़े स्तर पर विरोध
वरिष्ठ पत्रकार राजीव दत्त बताते हैं कि पहली बार मटक समुदाय ने इतने बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया है। 19 सितंबर को तिनसुकिया में निकली रैली में 50 हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए, जबकि 26 सितंबर को डिब्रूगढ़ की रैली में 30 हजार से अधिक लोग जुटे। इस भीड़ ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है।
अन्य जनजातियों का भी विरोध
मटक से पहले मोरान समुदाय ने भी डिब्रूगढ़ में अनुसूचित जनजाति के दर्जे की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन किया था। ऑल मोरान स्टूडेंट्स यूनियन के महासचिव जोयकांता मोरान ने बताया कि 2014 से अब तक सरकार के साथ कई बैठकें हुईं, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। इस बार 25 नवंबर तक का समय दिया गया है, वरना आर्थिक नाकेबंदी की चेतावनी दी गई है।




